श्री राम जन्मभूमि भाग-2
यह कहानी है अयोध्या नगरी की, हमारे प्रभु श्री राम की जन्मभूमि की! इसके प्रथम भाग में आप इसके ऐतिहासिक संदर्भ से परिचित हो चुके हैं, अब आगे! बात है 30 अक्टूबर 1990 की। अयोध्या की गलियों में सन्नाटा छाया हुआ था। पुलिस का सख्त पहरा था। तत्कालीन सरकार ने सख्त आदेश दिए थे कि 'अयोध्या में एक परिंदा भी पर नहीं मार सकता'। पुलिस वाले हंसकर कह रहे थे—"देखा! हमने किसी को आने नहीं दिया!" लेकिन, जब दिल में भक्ति और सच का हौसला हो, तो क्या कोई रोक सकता है? अचानक दूर से जयकारों की आवाज गूंजने लगी—"जय श्री राम! राम लला हम आए हैं, मंदिर वहीं बनाएंगे!" लाखों कारसेवक, श्री अशोक सिंघल जी के नेतृत्व में अयोध्या पहुंच गए। पुलिस ने उन्हें रोकने के लिए लाठीचार्ज किया। अशोक सिंघल जी के सिर पर चोट भी लगी, पर वे पीछे नहीं हटे। उग्र माहौल में कारसेवकों ने आगे बढ़कर विवादित ढांचे पर भगवा ध्वज फहरा दिया। लेकिन सरकार के आदेश पर पुलिस ने भीषण गोलीबारी कर दी, जिसमें कई कारसेवक शहीद हो गए और सैकड़ों घायल हुए।" कहानी आगे बढ़ती है 2 नवंबर 1990 को। कार्तिक पूर्णिमा का पवित्र दिन था। रामभक्त सरयू नदी में स्नान करके शांत भाव से भजन गाते हुए आगे बढ़ रहे थे। पुलिस ने उन्हें चारों तरफ से घेर लिया। भक्त वहीं जमीन पर बैठकर 'रामधुनी' गाने लगे—"जय राम, जय राम, जय जय राम..." तभी बिना किसी चेतावनी के फिर से गोलियां चलने लगीं! अयोध्या की गलियों में अफरा-तफरी मच गई। इसी भीड़ में कोलकाता से आए दो सगे भाई थे—22 साल के रामकुमार कोठारी और 20 साल के शरद कोठारी। वे एक घर में छिपे थे। जब पुलिस छोटे भाई शरद को पकड़कर ले जाने लगी, तो बड़े भाई रामकुमार उसे बचाने के लिए दौड़े। पुलिस ने दोनों भाइयों को बहुत ही क्रूरता से गोलियों का निशाना बना दिया और वे दोनों वहीं शहीद हो गए। तुलसी चौराहा और अयोध्या की सड़कें खून से लाल हो गईं। इस घटना की खबर से पूरा देश दुखी और स्तब्ध हो गया।"
जब अन्याय बढ़ता है, तो बदलाव भी आता है। देश भर में भारी विरोध हुआ और उत्तर प्रदेश में चुनाव हुए। 24 जून 1991 को श्री कल्याण सिंह जी उत्तर प्रदेश के नए मुख्यमंत्री बने। मुख्यमंत्री बनते ही वे अगले ही दिन अपनी पूरी कैबिनेट के साथ अयोध्या पहुंचे और रामलला के दर्शन किए। उन्होंने हाथ जोड़कर वचन लिया—"मैं शपथ लेता हूँ कि रामलला का भव्य मंदिर वहीं बनेगा, जहाँ वे विराजमान हैं!" कल्याण सिंह जी की सरकार ने भक्तों की सुविधा के लिए जमीन का अधिग्रहण भी किया।"
"फिर आया वह ऐतिहासिक दिन—6 दिसंबर 1992! देशभर से लाखों कारसेवक अयोध्या पहुंचे थे। मंच से नेताओं ने कहा था कि सभी सरयू नदी से जल और बालू लाकर सांकेतिक कारसेवा करेंगे। लेकिन वर्षों से दिल में जमा दर्द और गुस्सा रोक पाना मुश्किल था। अचानक भीड़ ने सारे घेरे तोड़ दिए और हजारों कारसेवक ढांचे पर चढ़ गए। देखते ही देखते दोपहर तक गुलामी का प्रतीक वह ढांचा पूरी तरह धराशायी हो गया! दिल्ली से गृह मंत्री ने तुरंत मुख्यमंत्री कल्याण सिंह को फोन किया—"कल्याण सिंह जी, कारसेवकों पर गोली चलाइए और परिसर खाली कराइए!" लेकिन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह जी ने साफ इनकार कर दिया। उन्होंने कहा—"मैं अपने निहत्थे रामभक्तों पर गोली बिल्कुल नहीं चलवाऊँगा! मुख्यमंत्री की कुर्सी तो आती-जाती रहेगी, लेकिन किसी मासूम की जान नहीं जानी चाहिए!" शाम 4 बजे ढांचा गिर चुका था और कारसेवकों ने वहीं पर तिरपाल (टेंट) लगाकर रामलला का एक अस्थाई मंदिर बना दिया। इसके बाद कल्याण सिंह जी सीधे राजभवन गए और उन्होंने खुशी-खुशी अपने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया।"
"ढांचा गिरने के बाद केंद्र सरकार ने रामभक्तों के संगठनों पर प्रतिबंध लगा दिया और रामलला के दर्शन रोक दिए। लेकिन संतों और वकीलों ने अदालत में कानूनी लड़ाई शुरू की। 1 जनवरी 1993 को हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि श्रद्धालु रामलला के दर्शन कर सकते हैं। पाठकों, क्या आप जानते हैं कि खुदाई में क्या मिला?
अदालत के आदेश पर जब 'भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण' (ASI) ने उस जगह की खुदाई की, तो जमीन के नीचे से शिव-पार्वती की मूर्तियां, नक्काशीदार खंभे, मंदिर के शिखर का आमलक और 50 खंभों की नींव मिली! इससे यह साबित हो गया कि वहां पहले एक भव्य हिंदू मंदिर ही था।"
"इस आंदोलन में भक्तों ने बहुत दुख भी सहे। 27 फरवरी 2002 की सुबह गुजरात के गोधरा स्टेशन पर साबरमती एक्सप्रेस ट्रेन रुकी। उसमें अयोध्या से लौट रहे रामभक्त सो रहे थे। उपद्रवियों ने ट्रेन के S-6 कोच को बाहर से बंद कर दिया और उसमें आग लगा दी। इस भीषण अग्निकांड में 58 मासूम रामभक्त (महिलाएं और बच्चे भी) जिंदा जल गए।"
"वर्षों तक यह मामला अदालतों में चलता रहा। फिर आया वह महान दिन—9 नवंबर 2019! भारत के सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) की 5 जजों की पीठ ने एक सर्वसम्मत फैसला सुनाया। अदालत ने साक्ष्यों के आधार पर माना कि विवादित भूमि पर रामलला का ही अधिकार है। कोर्ट ने सरकार को आदेश दिया कि मंदिर निर्माण के लिए एक ट्रस्ट बनाया जाए! इसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने 'श्री रामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट' का गठन किया।"
"5 अगस्त 2020 को प्रधानमंत्री जी ने भव्य राम मंदिर का शिलान्यास किया। दिन-रात काम चला और 500 सालों का लंबा इंतजार खत्म हुआ! 22 जनवरी 2024 को शुभ मुहूर्त में, 5 वर्ष के बाल रूप में हमारे प्यारे 'रामलला' अपने भव्य और दिव्य महल जैसे मंदिर के गर्भगृह में विराजमान हो गए! पूरे भारत और विश्व भर के लोगों ने दीप जलाकर दीपोत्सव मनाया!
Leave a Reply