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JCK-H-016-Roop Jo Badala Nahin Jata

Friday, 11/09/2026 12:41 PM
Author
Chief Editor
Volume/Serial
16
Category
Other Pub.
Language
Hindi
JCK-H-016-Roop Jo Badala Nahin Jata

JCK-H-016-Roop Jo Badala Nahin Jata

Category 1
Category 4
NA

रूप जो बदला नहीं जाता

फिरोजाबाद के समीप चन्द्रवार नामक स्थान की घटना है, कि पद्मावती जाति में गुलाल नामक प्रसिद्ध व्यक्ति ने 16 व 17 वीं शताब्दी में जन्म लिया। माता पिता का दलार, परिवार एवं मित्रों का स्नेह प्राप्त कर आनंद से रहते थे। आपने ग्वालियर के भट्टारक स्वस्ति श्री जगभूषण जी के समीप में रह कर धर्मशास्त्र, गणित, व्याकरण, काव्य, साहित्य, छन्द अलंकार एवं संगीत की शिक्षा अल्प काल में प्राप्त की। विद्या के साथ विनयगुण पात्रता, धार्मिक वृत्ति आदि सद्गुणों का समावेश लघु उम्र में प्राप्त कर लिया। संगीत में विशेष रुचि होने से लावनी और चौपाई दोहे आदि सुनने मनाने का चाव था। आपने युवा अवस्था में ही वीर श्रृंगार हास्य रस से युक्त रचनाओं के साथ रामलीला रामलीला नाटक एवं स्वांग भरने नृत्य कला तथा तद्रूप आचरण दिखाने की प्रवृत्ति से माता पिता तथा परिवार के सभी सदस्य बहुत दुखी थे अनेक हितैषियों के समझाने एवं मना करने पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा तथा मना करने पर ये त्योहारों, वसंतोत्सव एवं मेलों आदि में बढ़चढ़ के भाग ले कर लोगों का मनोरंजन करतें नृत्य कला की प्रसिद्धि से चारों ओर सम्मान के साथ आपकी प्रतिष्ठा बढ़ी तथा आपकी ख्याति राज दरबार तक पहुंची किंतु प्रधान मंत्री को ईष्या हुई। कीर्ति को कम करने की दृष्टि से गंभीर षड्यंत्र रचा तथा राजकुमार को उकसाकर कहा कि ब्रहमगुलाल से कहो कि यह सिंह का स्वांग करें। ब्रह्मगुलाल ने स्वीकार तो किया किंतु विनय पूर्व महाराज से निवेदन किया कि इस स्वांग में कोई भूल चूक हो जाये तो मुझे क्षमा किया जाए। राजा ने स्वीकृति दे दी। राजनीति के चतुर खिलाड़ी की चाल सफल हो रही थी वह सोच रहा था कि यह श्रावक कल में जन्मा है तथा अहिंसा, दमा, जीव रक्षा की शिक्षा वाल्य काल से दी गई है सिंह स्वांग के अभिनय में उसके लिए ऐसा अवसर आना चाहिए जिससे उसकी परीक्षा जीव बध से की जाये यदि जीव व करेगा तो यह श्रावक पद से रहित हो जायेगा और जीव हिंसा नहीं करेगा तो अपयश होगा। कलाकार ब्रह्मगुलाल ने सिंह का रूप बनाया तथा दहाड़ते हुए राजसभा में पहुंचे। वहां पर बकरी देखी तो स्वांगवृत्ति धारक ब्रह्मलाल कुछ सोच ही रहे थे कि राजकुमार ने कहा
"सिंह नहीं स्यार है, भारत नाहि शिकार।
वृषा जनम जननी दियो जीवन को धिक्कार।।'
अपमान के शब्द सुनते ही ब्रह्मगुलाल की आत्मा विशुच्ध हो गई। बकरी पर से ध्यान हटा क्रोधावेश में उछाल मारी तथा राजकमार के गाल पर जोरदार झप्पटा मारा। राजकुमार घायल होकर बेसुध गिर पड़ा। घातक हमले से राजकमार के प्राण पखेरू उड़ गये। राजा को पुत्र वियोग का दुःख बैचेन कर रहा था। मंत्री ने राजा को पुनः सलाह दी कि मगुलाल को आदेश दें कि दिगम्बर मुनि बन कर शोकाकुल परिवार को शान्ति का उपदेश दें। ब्रहमगुलाल ने दिगम्बर मुनि का रूप धारण कर संसार श्री असारता का उपदेश दिया राजा को आत्म शान्ति की दिशा दिखाई तथा राजा ने मनि भेष धारी ब्रह्मगलाल से कहा कि आप जो भी मांगना चाहो मांगो परंतु दिगम्बर मुनि ने कुछ नहीं मांगा तथा अपनी पिच्छी कमंडलु ले कर चार हाथ भूमि शोधन करते हुए बन में चले गये। गुलाल के मित्र मथुरा मल जी उनको समझाने गये तब मुनि श्री ने मथुरा मल से कहा कि यह जो स्वाग भरा है यह एक ही बार धारण किया जाता है संसार की असारता को समझ कर मित्र मरा मल ने भी दीक्षा ले ली। यही दिगम्बर मुनि का सही रूप है।


च. धर्म चंद शास्त्री प्रतिष्ठाचार्य ज्योतिषाचार्य

  • जैन चित्र कथा   
  • शीर्षक : रूप जो बदला नहीं जाता
  • संख्या: 16
  • कुल पृष्ठ : 36
  • भाषा : हिंदी
  • प्रकाशक : आचार्य धर्मश्रुत्र ग्रंथमाला
  • प्रथम प्रकाशित : ……

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