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DWC-H-054-आचार्य भद्रबाहु

Saturday, 12/09/2026 11:33 AM
Author
Chief Editor
Volume/Serial
54
Category
Other Pub.
Language
Hindi
DWC-H-054-आचार्य भद्रबाहु

DWC-H-054-आचार्य भद्रबाहु

आचार्य भद्रबाहु
जैन परम्परा में अंतिम केवली जम्बू स्वामी के बाद छह श्रुतकेवली हुए। श्रुतकेवली का अर्थ है - केवल ज्ञानी नहीं होते हुए भी अपने शास्त्र ज्ञान के बल पर केवली के समान ज्ञानी। आचार्य भद्रबाहु पाँचवें श्रुतकेवली थे जो चौदह पूर्व के ज्ञाता थे। आचार्य भद्रबाहु का व्यक्तित्व अत्यन्त प्रभावशाली और तेजोमय था। श्वेताम्बर - दिगम्बर दोनों परम्पराओं में उनका आदरपूर्ण स्थान है। उन्होंने नेपाल की पर्वतमालाओं में जाकर बारह वर्ष तक महाप्राण ध्यान की साधना की, जो एक उच्चकोटि की साधना थी। आचार्य भद्रबाहु के समय में मगध में नंदवंश का शासन था। उनका जन्म दक्षिण भारत के प्रतिष्ठानपुर में भगवान महावीर के निर्वाण के 64वें वर्ष में (वि. पू. 376) हुआ । 45 वर्ष की अवस्था में वि. पू. 331 में आचार्य यशोभद्रसूरि के पास जैन श्रमण दीक्षा ली। 76 वर्ष की अवस्था में वीर निर्वाण संवत् 170 में (वि. पू. 370) में उनका स्वर्गवास हुआ।
आचार्य यशोभद्र के दो प्रमुख श्रुतधर शिष्य थे - आचार्य सम्भूतविजय तथा आचार्य भद्रबाहु। आर्य स्थूलभद्र आचार्य संभूतविजय के शिष्य थे, संभूतविजय के स्वर्गवास पश्चात वि. पू. 314 में भद्रबाहु आचार्य बने। स्थूलभद्र आदि पांचसौ श्रमणों ने भद्रबाहु के पास पूर्वों का अध्ययन प्रारम्भ किया परन्तु केवल स्थूलभद्र अकेले ही उनसे दस पूर्वों का अर्थसहित ज्ञान प्राप्त कर सके। जैन परम्परा में भद्रबाहु नाम के अनेक आचार्य हुए हैं। उनकी घटनाएँ भी परस्पर घुलमिल गई हैं। अनेक ग्रंथों में अनेक प्रकार की घटनाएँ मिलती हैं । श्रुत केवली आचार्य भद्रबाहु और वराह मिहिर परम्परानुसार भाई थे। किन्तु वराह संहिताकार वराह मिहिर और आचार्य भद्रबाहु के सत्ताकाल में कई शताब्दियों का अन्तर है। सम्भव है नाम साम्य से एक हो गये हों। श्रुति परम्परानुसार उपदेशमाला टीकाकार श्री रत्नप्रभसूरि ने अपनी ‘“दोघट्टी टीका " रचना संवत् 1238 में इस घटना का उल्लेख किया है, उसी के आधार पर यह कथानक यहाँ दिया गया। आचार्यश्री विजय सुशील सूरीश्वर जी के पट्टधर आचार्य श्री विजय जिनोत्तम सूरीश्वर जी ने इस पुस्तक का लेखन कर हमें अनुग्रहीत किया है।
- महोपाध्याय विनय सागर            - श्रीचन्द सुराना 'सरस'

 

  • दिवाकर चित्र कथा   
  • शीर्षक : आचार्य भद्रबाहु
  • संख्या: 54
  • कुल पृष्ठ : 36
  • भाषा : हिंदी
  • प्रकाशक : श्री दिवाकर प्रकाशन
  • प्रथम प्रकाशित : ……

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