अमृत पुरुष गौतम
हिन्दूधर्म में जो स्थान विघ्न विनाशी गणेश का है। जैनधर्म में वही स्थान और महत्त्व गणधर इन्द्रभूति गौतम का है। गणधर गौतम का नाम ही एक मंगल मंत्र है। विघ्न विनाशक और सद्बुद्धि प्रदाता के रूप में उनकी महिमा है। लाखों श्रद्धालु गणधर गौतम का पवित्र नाम स्मरण करते हुए यह पद्य बोलते हैं-
अंगूठे अमृत बसै, लब्धितणां भण्डार।
श्री गुरु गौतम सुमरिये, वांछित फल दातार॥
श्रद्धालुजनों में इस प्रकार का विश्वास है कि गौतम नाम प्रभाव से भण्डार कभी खाली नहीं होता। गणधर इन्द्रभूति गौतम भगवान महावीर के प्रथम एवं प्रधान शिष्य थे। वे वेद-वेदांग के विश्व-विख्यात महापण्डित थे। बाद में भगवान महावीर के पास दीक्षित होकर सम्पूर्ण 14 पूर्वों के ज्ञानी हो गये। इतने महान् ज्ञानी होकर भी गौतम गणधर अत्यन्त विनम्र, जिज्ञासु, सत्य शोधक, स्वावलम्बी, उग्र तपस्वी, गहन ध्यानयोगी और इन्द्रिय विजेता थे। राजगृह - नालन्दा के नजदीक गोब्बर ग्राम में ईस्वी पूर्व 607 में एक सम्पन्न ब्राह्मण परिवार में उनका जन्म हुआ। वे तीन भाई थे और तीनों ही अपने युग के महापण्डित थे। 50 वर्ष की अवस्था में वे भगवान महावीर के पास 500 शिष्यों के साथ दीक्षित हुए। दीक्षा लेते ही गणधर पद पर प्रतिष्ठित हो गये। दीक्षा के बाद 30 वर्ष तक निरन्तर भगवान महावीर के साथ रहे। भगवान महावीर-निर्वाण के दूसरे ही दिन उन्हें केवलज्ञान प्राप्त हुआ। उसके 12 वर्ष पश्चात् उन्होंने वीर संवत् 12 में मोक्ष प्राप्त किया। विद्वान् मनीषी आचार्य श्री विजय नित्यानंद सूरीश्वर जी महाराज ने गणधर इन्द्रभूति गौतम के जीवन की प्रेरक घटनाओं को चित्रकथा के रूप में प्रस्तुत कर महान् उपकार किया है। हम आपके आभारी हैं।
-महोपाध्याय विनयसागर -श्रीचन्द सुराना 'सरस'
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