नन्द मणिकार
जीवन का निर्माण करने में भावनाओं का बड़ा महत्त्व है। भोजन से जैसे शरीर को होता है उसी प्रकार भावना और विचारों से आंतरिक व्यक्तित्व का निर्माण होता है। भावना ही संस्कार बन जाती है, जो जन्म-जन्म की यात्रा में साथ रहती है। नन्द मणिकार की कथा, इस सत्य को प्रकट करती है। अतीत में जीये हुए जीवन को सुधारने और अगले जन्म को सुगतिगामी बनाने के लिए अन्तिम समय की भावनाओं का बड़ा महत्त्व है। प्राण त्याग करते समय यदि प्राणी की भावनाएँ शुद्ध, पवित्र और भगवद्-भक्ति में लीन होती हैं तो उसका अगला जन्म ऐसा होगा जिसे हम सद्गति कह सकते हैं। इसके विपरीत भावनाओं में यदि क्लेश, द्वेषयुक्त चंचल एवं क्षोभपूर्ण भाव होंगे तो निश्चित ही अगला जन्म वैसा ही क्लेशमय होगा। इसी को कहते हैं अन्त मति सो गति।
यदि अपने किये हुए सत्कर्म के साथ भी नाम और प्रशंसा की आसक्ति बँधी रहती है तो उसका शुभ फल तो नष्ट होता ही है, आसक्ति के कारण दुर्गति में भी जाना पड़ता है। इसके साथ ही शुभ भावना से किया हुआ थोड़ा-सा सत्कर्म भी महान फलदायी होता है। ज्ञातासूत्र में भगवान महावीर ने नन्द मणिकार की जीवन घटना को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करके यही बताया है कि मनुष्य जो भी शुभ कर्म करे वह नाम, यश आदि की लालसा से मुक्त होकर करे। प्रस्तुत कृति का लेखन जिनशासन प्रभाविका जैन ज्योति उपप्रवर्तिनी श्री स्वर्णकान्ता जी म. द्वारा सम्पन्न हुआ है। हम आपके आभारी हैं।
-महोपाध्याय विनयसागर - श्रीचन्द सुराना 'सरस'
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