Welcome to Madhur Sangrah - Another essence of MADHUR BAL PUSTAKALAYA | Classic n Vintage Old Books and Comics got here new Life | Reengage with your timeless classics and modern favorites |

Madhur Sangrah - Where Paper Meets Pixel

×
If You want to read these contents or you have any complain or suggestions please write to editor.madhursangrah@gmail.com If You want to read these contents or you have any complain or suggestions please write to editor.madhursangrah@gmail.com
Translate

DWC-H-023-Jagadguru Sri Heer Vijay Suri

Saturday, 12/09/2026 08:19 PM
Author
Chief Editor
Volume/Serial
23
Category
Other Pub.
Language
Hindi
DWC-H-023-Jagadguru Sri Heer Vijay Suri

DWC-H-023-Jagadguru Sri Heer Vijay Suri

जगद्गुरु श्री हीर विजय सूरि
संसार में कुछ महापुरुष ऐसे होते हैं जो इतिहास के मुख्य पात्र ही नहीं इतिहास के निर्माता भी होते हैं। विक्रम की सोलहवीं शताब्दी में हुए जैन आचार्य श्री हीरविजयसूरीश्वर जी एक ऐसे ही महापुरुष थे, जिन्होंने न केवल जैन इतिहास पर अपितु सम्पूर्ण भारतीय इतिहास पर अपनी अमिट छाप छोड़ी है। भारत के इतिहास को एक नया स्वरूप प्रदान करने में प्रमुख भूमिका भी निबाही है। विक्रम की सोलहवीं शताब्दी भारतीय इतिहास में उथल-पुथल का युग था । मुगल बादशाह अकबर अपने अद्वितीय पराक्रम, राजनीतिक कौशल, धार्मिक उदारता, न्यायप्रियता और गुणज्ञता आदि गुणों के कारण भारतवर्ष के विशाल भू-भाग पर शासन कर रहा था। अकबर विद्वानों और त्यागियों का आदर करता था। श्री हीरविजयसूरि जैसे जैनाचार्य के प्रति उसका आदरभाव इस सीमा तक पहुँच गया था कि लोग कहने लग गये- बादशाह अकबर मुसलमान धर्म छोड़कर जैन बन गया।
श्री हीरविजयसूरि का बाह्य व्यक्तित्व बहुत आकर्षक और प्रभावशाली था। उनके व्यक्तित्व में चुम्बकीय आकर्षण था। वाणी में बड़ी चमत्कारी शक्ति थी। उनके वचनों में मधुरता, शालीनता के साथ उच्चकोटि की विद्वत्ता झलकती थी। जैनधर्म की अनेकांतवादी दृष्टि के अनुसार वे श्रेष्ठ समन्वयवादी और परधर्म-सहिष्णु होने के साथ ही अपनी धार्मिक आस्था में अत्यन्त स्थिर व साधु-जीवन की मर्यादाओं का दृढ़ता तथा ईमानदारी के साथ पालन करते थे। शहंशाह अकबर जैसा भक्त बार-बार उन्हें कहता - "गुरुजी, कुछ सेवा बताइए।" तो सूरीश्वर उत्तर देते - " दूसरों का भला करो, जीवों को अभयदान दो, प्रजा के कष्ट दूर करो, बस यही मेरी सेवा है।" इस उत्कृष्ट निष्पृहता ने बादशाह के मन को बहुत प्रभावित किया। सूरीश्वर का लगभग 3 वर्ष से कुछ अधिक समय तक बादशाह अकबर के साथ निकट सम्पर्क रहा। उसके बाद उनके प्रमुख विद्वान् शिष्य विजयसंनमूरि, भानुचन्द्र उपाध्याय, शान्तिचन्द्र उपाध्याय आदि अकबर के सम्पर्क में रहे, कश्मीर एवं लाहौर की यात्राओं में भी साथ रहे और समय-समय पर बादशाह को अहिंसा, परोपकार जीवदया की प्रेरणा देते रहे।
जैनाचार्यों के इस सम्पर्क का ही यह प्रभाव था कि क्रूर बाबर का वंशज मुसलमान बादशाह अकबर ने लगभग छह महीनों तक से भी ज्यादा दिन अपने सम्पूर्ण राज्य में पशु वध एवं जीव हिंसा निषेध के फरमान जारी किये और स्वयं ने वर्ष में छह महीनों से ज्यादा दिनों के लिए माँस सेवन व शिकार छोड़कर एक दयालु अहिंसा-प्रेमी शासक के रूप में प्रतिष्ठित हुआ।
      -महोपाध्याय विनयसागर  - श्रीचन्द सुराना 'सरस'

  • दिवाकर चित्र कथा   
  • शीर्षक :जगद्गुरु श्री हीर विजय सूरि
  • संख्या: 23
  • कुल पृष्ठ : 36
  • भाषा : हिंदी
  • प्रकाशक : श्री दिवाकर प्रकाशन
  • प्रथम प्रकाशित : ……

Comments

Leave a Reply

Login to comment