अमर हुतात्मा महान शिक्षाविद्, कांतिकारी स्वामी श्रद्धानन्द
स्वामी जी, अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ने के कारण उन पर पाश्चात्य सभ्यता का रंग चढ़ गया और वे अनीश्वरवादी तथा भोगपरस्त व्यक्ति बन गये थे । परन्तु एक बार अपने पिता के कहने पर वे आर्यसमाज के संस्थापक 'महर्षि दयानन्द' का प्रवचन सुनने चले गये तभी से उनके जीवन में बदलाव आने लगा और आगे चलकर वे एक सच्चे आर्यसमाजी बन गये। उन्होंने महर्षि दयानन्द की इच्छा को पूर्ण करने के लिए हरिद्वार में 'गुरुकुल कांगड़ी' नामक शिक्षण संस्थान की स्थापना की जो आज विश्व का प्रख्यात विश्वविद्यालय है। स्त्री शिक्षा के प्रबल हिमायती स्वामी श्रद्धानन्द को अछूतों का उद्धार करने के कारण महान समाज सुधारक माना जाता है। वह पहले व्यक्ति थे जिन्होंने पवित्र वेद मंत्रों का उच्चारण करते हुए जामा मस्जिद की मिम्बर से लोगो को स्वराज एवं स्वधर्म के लिए प्रेरित करने का साहस किया था। स्वामी जी की निःस्वार्थ सेवा भावना से दिल्ली का प्रबुद्ध मुस्लिम समुदाय बेहद प्रभावित था ।
स्वामी श्रद्धानन्द की यह प्रेरणादायक चित्रकथा विशेषतौर पर बच्चों, किशोरों और युवाओं के लिए तैयार की गयी है, ताकि वे भी उनके जैसे स्वदेशभक्त, स्वाभिमान, वैदिक धर्म और भारतीय संस्कारों के रंग में रंग जाएँ।
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