करकण्डू जाग गया
'प्रत्येकबुद्ध' शब्द जैन - परम्परा का एक खास शब्द है, जिसका अर्थ है वह पवित्र विवेकी आत्मा जो किसी एक खास घटना से प्रेरित होकर आत्म-ज्ञान प्राप्त कर ले तथा संसार के काम, क्रोध, लोभ, अहंकार आदि का त्याग कर आत्म-साधना में प्रवृत्त हो जाए। यों तो ऐसे प्रत्येकबुद्ध हर युग में होते रहे हैं और अगणित हुए हैं। किन्तु उपलब्ध जैन साहित्य में चार प्रत्येकबुद्ध की कथाएँ बहुत प्रसिद्ध हैं। इनमें रोचकता के साथ जीवन का उच्च विकास करने की प्रेरणा भी है।
इस कथा के पात्र हैं कलिंग देश के शक्तिशाली राजा करकण्डू। करकण्डू चम्पा नरेश दधिवाहन का पुत्र था। रानी पद्मावती (भगवान महावीर की मौसी) इसकी माता थी। किन्तु परिस्थितियों की मजबूरीवश उसका लालन-पालन एक श्मशान - रक्षक मातंग (जिसे उस युग की भाषा में 'चंडाल' कहते थे) के घर पर हुआ। करकण्डू अपने जन्मजात गुणों के कारण एक प्रतापी सम्राट् बना और उस युग में एक क्रांति की लहर पैदा कर दी - चंडाल जाति को संस्कार दीक्षा देकर ब्राह्मण बनाया। यह घटना आज के युग में भी वड़ी प्रासंगिक और आदर्श है तथा धर्म व जाति-परिवर्तन के बजाय संस्कार- परिवर्तन का सन्देश देती है। वैसे करकण्डू का पूरा जीवन ही साहस व निर्भयतापूर्वक सदाचारमय जीवन जीने का उद्घोष है। बूढ़े बैल को देखकर यौवन व जीवन की क्षणभंगुरता का भान होना उसके हृदय की पवित्रता का सूचन करती है। इतिहासकारों के अनुसार प्रत्येकबुद्ध करकण्डू यों तो भगवान महावीर के युग में हुए हैं, किन्तु भगवान महावीर के तीर्थंकर बनने से पहले ही उनका प्रत्येकबुद्ध होना उन्हें भगवान पार्श्वनाथ तीर्थ से भी जोड़ देता है।
इस पुस्तक का लेखन श्रमणसंघ के उत्तर भारतीय प्रवर्त्तक भण्डारी श्री पद्मचन्द्र जी म. के शिष्य उपप्रवर्तक श्री अमर मुनि जी म. के शिष्य श्री पंकज मुनि जी ने किया है।
-महोपाध्याय विनयसागर -श्रीचन्द सुराना 'सरस'
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