अजातशत्रु कूणिक
मनुष्य की आवश्यकताएँ तो बहुत सीमित हैं, किन्तु आकांक्षाएँ असीम हैं। सभी प्रकार के भौतिक सुख-साधन प्राप्त होने पर भी असीम आकांक्षाओं के कारण वह सदा संतप्त, चिंतित, तनावग्रस्त और जीवनभर संघर्षों की चक्की में पिसता रहता है। आकांक्षा जब पर फैलाती है तो महत्वाकांक्षा का रूप ले लेती है। संसार में जितने भी युद्ध, रक्तपात, हत्याएँ, संघर्ष और षड्यंत्र हो रहे हैं उनके मूल में महत्वाकांक्षा की चिनगारी सुलगती मिलेगी । महत्वाकांक्षाओं का शिकार व्यक्ति अपना धर्म, नीति, प्रेम, रिश्ते और यहाँ तक मानवीय संवेदना से भी शून्य हो जाता है।
२५०० वर्ष प्राचीन इतिहास में मगध नरेश श्रेणिक बिम्बसार के पुत्र अजातशत्रु कूणिक का नाम एक महत्वाकांक्षी सम्राट् के रूप में लिया जाता है। यद्यपि वह भगवान महावीर के जीवन व उपदेशों से बहुत प्रभावित था, भगवान महावीर के प्रति अपार श्रद्धा-भक्ति भी रखता था, किन्तु फिर भी अपनी दुर्दान्त इच्छाओं का दास बनकर उसने जो इतिहास रचा है, वह एक साम्राज्य - लिप्सु महत्वाकांक्षी सम्राट् का चरित्र है। जैन ग्रंथों में उसका नाम अशोकचन्द्र कूणिक प्रसिद्ध है तो बौद्ध साहित्य में उसे अजातशत्रु नाम से प्रसिद्धि मिली। अजातशत्रु ने साम्राज्य - लिप्सा के कारण अपने सगे भाइयों के साथ युद्ध किया और वैशाली जैसी सुन्दर देव दर्शनीय नगरी का विध्वंस कर मानव रक्त से मिट्टी को रंगा, उस घोर कुकृत्य की निन्दा स्वरूप भगवान महावीर ने उसे नरक का अधिकारी बताकर एक प्रकार से उसकी नकली भक्ति को भी मूल्यहीन कर दिया।
प्रस्तुत कथा में जैन ग्रंथों के आधार पर अजातशत्रु कूणिक के जन्म से लेकर मृत्यु तक की घटनाएँ ली गई हैं । यह चरित्र हमें इच्छा आकांक्षाओं पर नियंत्रण करने की शिक्षा देता है।
इस पुस्तक का लेखन श्रमणसंघ के उत्तर भारतीय प्रवर्त्तक भण्डारी श्री पद्मचन्द्र जी म. के शिष्य उपप्रवर्तक श्री अमर मुनि जी म. के शिष्य श्री तरुण मुनि जी ने किया है।
-महोपाध्याय विनयसागर -श्रीचन्द सुराना 'सरस'
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