दादागुरु श्री जिन कुशल सूरि
जैन शासन की महान् सेवा करने वाले प्रभावक आचार्यों में श्री जैन श्वेताम्बर खरतरगच्छीय चार दादा गुरुओं का नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित है। युगप्रधान दादा जिनदत्त सूरि उनके सुशिष्य मणिधारी जिनचन्द्र सूरि और उसी परम्परा के प्रभावक युगप्रधान श्री जिनकुशल सूरि तथा श्री जिनचन्द्र सूरि की बड़ी ख्याति है। जैनधर्म की प्रभावना और विस्तार करने में इनका अपूर्व योगदान रहा है। वत्सलता, दयालुता और संकट के समय भक्तजनों की सहायता करने के कारण उनका नाम 'दादा गुरुदेव' नाम से प्रसिद्ध हुआ।
चारों दादा गुरुओं में तीसरे दादा गुरु श्री जिनकुशल सूरि का नाम आज सबसे अधिक लोकोपकारी व भक्त वत्सल के रूप में प्रसिद्ध है। उनके अद्भुत संकल्पबल और साहस का ही यह प्रभाव था कि मारवाड़ से दूर सिंध प्रान्त में उन्होंने पाँच वर्ष तक जैनधर्म की ध्वजा फहराई। मुगल शासकों का शासन होते हुए भी र्निविघ्न रूप से जिनधर्म की प्रभावना की। सिंध में 50 हजार से अधिक लोगों को - कुव्यसन, शिकार, माँस, मदिरा का त्याग करवाकर जैन बनाया। मुसलमान बादशाह, नवाब और सैंकड़ों मुसलमानों के अलावा हजारों ब्राह्मण क्षत्रिय आदि भी उनके भक्त थे।
पूरे राजस्थान, मालवा, गुजरात, सौराष्ट्र, तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र, पंजाब, सिंध, दिल्ली, बिहार, बंगाल आदि में लगभग 200 से अधिक उनके स्तूप व दादावाड़ीयां हैं। इस पुस्तक में बहुत ही संक्षेप में उनका जीवन चरित्र चित्रकथा के रूप में अंकित किया गया है। उनके चमत्कारों की तो हजारों घटनायें हैं । यहाँ पर केवल 4-5 घटनाओं का ही लेखन किया गया है।इस प्रकाशन की प्रेरणा जिन शासन प्रभाविका, प्रवर्तिनी श्री सज्जन श्री जी म. सा. की विदुषी शिष्या महासती श्री शशिप्रभा श्री जी म. ने प्रदान की, उनकी प्रबल प्रेरणा, मार्गदर्शन और प्रोत्साहन ही इस चित्रकथा का मूल आधार है । अतः उनके प्रति आभार व्यक्त करना तो मात्र औपचारिकता होगी। एक प्रकार से इस प्रकाशन का संपूर्ण श्रेय उन्हीं का है।
- महोपाध्याय विनय सागर - श्रीचन्द सुराना 'सरस'
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