Welcome to Madhur Sangrah - Another essence of MADHUR BAL PUSTAKALAYA | Classic n Vintage Old Books and Comics got here new Life | Reengage with your timeless classics and modern favorites |

Madhur Sangrah - Where Paper Meets Pixel

×
If You want to read these contents or you have any complain or suggestions please write to editor.madhursangrah@gmail.com If You want to read these contents or you have any complain or suggestions please write to editor.madhursangrah@gmail.com
Translate

ACK-H-393-Mahabharat 33-Dron Ki Pratigya

Thursday, 22/10/2026 06:55 PM
Author
Chief Editor
Volume/Serial
393
Category
ACK
Language
Hindi
ACK-H-393-Mahabharat 33-Dron Ki Pratigya

ACK-H-393-Mahabharat 33-Dron Ki Pratigya

महाभारत 33 : द्रोण की प्रतिज्ञा
भरतवंश की गाथा पर महर्षि वेदव्यास ने महाभारत नाम का महाकाव्य रचा। स्वयं व्यास की आज्ञा से उनके शिष्य वैशम्पायन ने उसे सबके बीच पढ़ कर सुनाया। यह कथावाचन व्यास के पौत्र के प्रपोत्र राजा जनमेजय और अनेक ऋषि-मुनियों की उपस्थिति में हुआ था। ये ऋषिमुनि जनमेजय के सर्पसत्र (बारह वर्ष तक चलने वाले सर्पयज्ञ) में एकत्र हुए थे। महाभारत के हमारे द्वारा प्रस्तुत बत्तीसवें खंड में इसका वर्णन था कि कौरव सेना के सेनापति भीष्म से संत्रस्त होकर पांडवों ने निश्चय किया कि अब भीष्म को मारना बहुत आवश्यक है। युध्द के दसवें दिन भीष्म घायल हो कर गिर पड़े। पर बाणों से बिंध शरीर लिये वे शरशय्या पर लेट कर उत्तरायण की समाप्ति की प्रतीक्षा करने लगे, ताकि शुभ घड़ी में प्राण त्याग सकें। लगभग उसी समय कर्ण ने अपने दिव्य कवच-कुंडल इंन्द्र को दान कर डाले और बदले में उससे अमोघ अस्त्र प्राप्त किया। 

  • अमर चित्र कथा 
  • महाभारत- 33
  • शीर्षक : द्रोण की प्रतिज्ञा
  • संख्या: 393
  • कुल पृष्ठ : 36
  • भाषा : हिंदी
  • प्रकाशक : इंडिया बुक हाउस प्रा. लि.
  • प्रथम प्रकाशित : 15 नवंबर 1987

Comments

Leave a Reply

Login to comment