महाभारत 33 : द्रोण की प्रतिज्ञा
भरतवंश की गाथा पर महर्षि वेदव्यास ने महाभारत नाम का महाकाव्य रचा। स्वयं व्यास की आज्ञा से उनके शिष्य वैशम्पायन ने उसे सबके बीच पढ़ कर सुनाया। यह कथावाचन व्यास के पौत्र के प्रपोत्र राजा जनमेजय और अनेक ऋषि-मुनियों की उपस्थिति में हुआ था। ये ऋषिमुनि जनमेजय के सर्पसत्र (बारह वर्ष तक चलने वाले सर्पयज्ञ) में एकत्र हुए थे। महाभारत के हमारे द्वारा प्रस्तुत बत्तीसवें खंड में इसका वर्णन था कि कौरव सेना के सेनापति भीष्म से संत्रस्त होकर पांडवों ने निश्चय किया कि अब भीष्म को मारना बहुत आवश्यक है। युध्द के दसवें दिन भीष्म घायल हो कर गिर पड़े। पर बाणों से बिंध शरीर लिये वे शरशय्या पर लेट कर उत्तरायण की समाप्ति की प्रतीक्षा करने लगे, ताकि शुभ घड़ी में प्राण त्याग सकें। लगभग उसी समय कर्ण ने अपने दिव्य कवच-कुंडल इंन्द्र को दान कर डाले और बदले में उससे अमोघ अस्त्र प्राप्त किया। 
ACK-H-391-Mahabharat 32-Dharashayi Bheeshm
ACK-H-395-Mahabharat 34-Abhimanyu Ka Vadh
ACK-H-397-Mahabharat 35-Jayadrath Vadh
ACK-H-399-Mahabharat 36-Madhyaratri Ka Yuddh
ACK-H-402-Mahabharat 37-Senapati Karn
ACH-H-404-Mahabharat 38-Kuruon Ka Parabhav
ACK-H-406-Mahabharat 39-Yuddh Ke Uparant
ACK-H-408-Mahabharat 40-Yudhisthir Ka Rajtilak
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