वानर राजकुमार
बंगाल की लोक-कथायें एक महान् धरोहर हैं। यह कहानियाँ दादी-नानियों के मुख से निस्सृत हो पोते-नातों तक आईं और इस तरह उन्होंनें इसे पीढ़ी-दर-पीढ़ी पहुँचाने की परम्परा को सजीव बनाए रखा। दक्षिणरंजन मित्रा मजूमदार ने जर्मनी के ग्रिम ब्रदर्स की भाँति बँगाल में भी वही कार्य करने का निश्चय किया। यह वास्तव में राष्ट्र के प्रति उनकी अमूल्य सेवा थी। उनके अथक परिश्रम से संचित यह कहानियाँ 'ठाकुरमार झूली' (दादीमाँ का झोला) के नाम से प्रकाशित हुई। रवीन्द्र नाथ टैगोर ने 72 वर्ष पूर्व, जब यह प्रकाशित हुई थी, इसके विषय में लिखा था कि यह अलौकिक चयन सर्वाधिक् राष्ट्रवादी है। इसके अद्वितीय गद्य व पद्य में दादी माँओं के मुख से निकली युगान्तरों से चली आने वाली बंगाल की लोक कथाओं का सार है। दक्षिण रंजन की जन्मशताब्दी के अवसर पर उनकी प्रसिद्ध लोक कथाओं में से इस कथा को जन-जन तक पहुँचाना आदर्श चित्र कथा के लिए गोरव की बात है।

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