महर्षि दयानन्द सरस्वती और उनके क्रान्तिकारी शिष्य
हमारा देश परतंत्रता की बेड़ियों में जकड़ा हुआ था। भारत के भाग्याकाश पर अविद्या और अंधकार की घटायें छाई हुई थीं। देश के अन्दर धर्म के पुजारियों ने धर्म के रूप को विकृत कर दिया था। छूआ-छूत, अशिक्षा और गरीबी का बोलबाला था। दूसरी ओर अंग्रेज हमारी प्राचीन भारतीय सभ्यता को पूरी तरह समाप्त करने के लिए तैयार थे। ऐसे में देश को जरूरत थी एक पथप्रद- र्शक की, जिसमें हमारे प्राचीन ऋषियों, महापुषों जैसे समस्त गुण हों। जिसमें हनुमान और भीष्म पितामह जैसे ब्रह्मचारी हों।
महर्षि दयानन्द सरस्वती ऐसे ही शुभ गुणों से सुभूषित महामानव थे। उनका जन्म सम्वत्- 1818 में फागुन वदी दशमी तिथि को, तदनुसार - 12 फरवरी सन् 1825 को गुजरात के मौरवी प्रान्त के गाँव टंकारा में श्री कर्षन जी तिवारी' औदीच्य ब्राह्मण' के घर हुआ था। उनका बचपन का नाम मूलशंकर था।
लेखक व चित्रांकन भारत मकवाना
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