महाभारत 31 : सेनापति भीष्म
भरतवंश की गाथा पर महर्षि वेदव्यास ने महाभारत नाम का महाकाव्य रचा। स्वयं व्यास की आज्ञा से उनके शिष्य वैशम्पायन ने उसे सबके बीच पढ़ कर सुनाया। यह कथावाचन व्यास के पौत्र के प्रयोग राजा जनमेजय और अनेक ऋषि-मुनियों की उपस्थिति में हुआ था। ये ऋषि-मुनि जनमेजय के सर्पसत्र (बारह वर्षों तक चलने वाले सर्पयज्ञ) में एकत्र हुए हुए थे। महाभारत के तीसवें खंड में इसका वर्णन था कि कृष्ण का संधि-प्रयत्न विफल हो जाने पर पांडवों ने युद्ध को अटल समझ कर उसकी तैयारी आरंभ कर दी। जब दोनों पक्षों की सेनाएं युद्धभूमि में एक दूसरे के विरुद्ध आ खड़ी हुई, तब अर्जुन का मन विषाद से भर उठा और यह सोच कर कि युद्ध में अपने बंधु-बांधवों का वध करना पड़ेगा, उसे युद्ध से ग्लानि हो गयी। तब श्रीकृष्ण ने उसे गीता का उपदेश दिया और क्षत्रिय-धर्म का पालन करते हुए युद्ध करने की प्रेरणा दी। 
ACK-H-385-Mahabharat 29-Shantidoot Shri Krishna
ACK-H-387-Mahabharat 30-Senayein Kurukshetra mein
ACK-H-391-Mahabharat 32-Dharashayi Bheeshm
ACK-H-393-Mahabharat 33-Dron Ki Pratigya
ACK-H-395-Mahabharat 34-Abhimanyu Ka Vadh
ACK-H-397-Mahabharat 35-Jayadrath Vadh
ACK-H-399-Mahabharat 36-Madhyaratri Ka Yuddh
ACK-H-402-Mahabharat 37-Senapati Karn
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