महाभारत 30 : सेनाएं-कुरुक्षेत्र में
भरतवंश की गाथा पर महर्षि वेदव्यास ने महाभारत नाम का महाकाव्य रचा। स्वयं व्यास की आज्ञा से उनके शिष्य वैशम्पायन ने उसे सबके बीच पढ़कर सुनाया। यह कथावाचन व्यास के पौत्र के प्रपौत्र राजा जनमेजय और अनेक ऋषि-मुनियों की उपस्थिति में हुआ था। ये ऋषि-मुनि जनमेजय के सर्पसत्र (बारह वर्षों तक चलने वाले सर्पयज्ञ) में एकत्र हुए थे।
महाभारत के हमारे द्वारा प्रस्तुत उनतीसवें खंड में इसका वर्णन था कि किस प्रकार कृष्ण कौरव-पांडवों के घरेलू झगड़े को शांतिपूर्वक सुलझाने के लिए कौरवों के पास गये। कृष्ण ने दुर्योधन को इसके लिए मनाने की कोशिश की, कि वह पांडवों को राज्य का एक हिस्सा दे दे। परंतु इसमें वे विफल रहे। कृष्ण और कुन्ती दोनों ने कर्ण को पांडवों के साथ आ मिलने के लिए फुसलाना चाहा। पर कर्ण ने इन्कार कर दिया. अब युद्ध का टलना असंभव हो गया। 
ACK-H-385-Mahabharat 29-Shantidoot Shri Krishna
ACK-H-389-Mahabharat 31-Senapati Bheeshm
ACK-H-391-Mahabharat 32-Dharashayi Bheeshm
ACK-H-393-Mahabharat 33-Dron Ki Pratigya
ACK-H-395-Mahabharat 34-Abhimanyu Ka Vadh
ACK-H-397-Mahabharat 35-Jayadrath Vadh
ACK-H-399-Mahabharat 36-Madhyaratri Ka Yuddh
ACK-H-402-Mahabharat 37-Senapati Karn
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