आंडल
सभी क्षेत्रों और वर्गों के लोग भगवान कृष्ण की उपासना करते हैं और अनुग्रह याचना करते हैं। सभी मनुष्य उन्हें अनादि बालक गीता के महान् व्याख्याता तथा दिव्य प्रेमी की दृष्टि से देखते हैं, आंडल ने उन्हें दिव्य प्रेमी के रूप में देखा। भगवान आत्मा को ऊँचा उठाकर आध्यात्मिक आनन्द उसके गीतों में प्रस्फुटित हुआ। कृष्ण के प्रति उसकी अटूट भक्ति ने उसकी आनन्द के धरातल पर पहुँचा दिया और यही अपने पदों के कारण वह पवित्रता के उस उच्च शिखर पर पहुँच गई कि आज भी लोग उसे पार्वती मानते हैं। तमिल साहित्य में आंडल का एक विशेष स्थान है। वह वैष्णवी कवि वंश की थी जो कि अलवरों के नाम से प्रसिद्ध थे यह कवि छठी शताब्दी ई० प० से दसवीं शताब्दी ई० प० तक दक्षिण में चेरा, चोला, पाण्डया तथा पलिवा राजाओं के राज्यों में थे। अलवर संख्या में बारह थे। उन्होंने बड़ी तन्मयता के साथ विष्णु भगवान और श्री कृष्ण के भजन गाए जिसके परिणाम स्वरूप वह वैष्णव सन्त कहलाए। इन सन्तों की जीवनियाँ गुरुपरम्परा ई में, अलवर वैपवम् अर्थात् अलवर इतिहास में मिलती हैं। जिनमें इनके जीवन की विभिन्न घटनाओं का वर्णन है। कुल मिलाकर संख्या में लगभग चार हजार श्लोक हैं जिनकी रचना इन बारह अलवरों ने की है। इनके संकलन को दिव्य प्रबन्धम् कहते हैं। दिव्य हस्त ने ही उल तथा उसके पिता दोनों को प्रेरणा दी और उनका मार्ग प्रदर्शन किया। उन्होंने अपने सन्तस् में भ्रमरण करके भगवान कृष्ण के जीवन और दिव्य सौन्दर्य के दर्शन किए। अन्त में ग्रॉउल सोलह वर्ष की सुकुमार प्रायु में भगवान के साथ एकलय हो गई। इस पुस्तक में वर्णित कथा कुछ ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित है तथा प्रॉउल द्वारा अपने रहस्यात्मक काव्य में कथित वर्णन है।

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