जैसल और तोरल
कच्छ क्षेत्र में अंजर, नाम का एक छोटा नगर था, जो कभी कुख्यात डाकुओं के छिपने का स्थल था। इन डाकुत्रों का एक निर्दयी सरदार था, जैसल। उसके नाम से ही लोगों के हृदय में भय व आतं समा जाता था। सती तोरल, जो पवित्रता की एक महान देवी थी, ने यह सिद्ध कर दिखाया कि जैसल जैसा क्रूर डाकू भी महात्मा बन सकता है। सती तोरल अपने पति सनसतिया जी के साथ धरोल नाम के गांव में निवास करती थी। उनकी दयालुता तथा सहानुभूति से जैसल का पत्थर समान कठोर हृदय भी पिघल गया और वह आध्यात्म की राह पर चलने लगा। इस मार्ग पर चलकर उसने आत्म-ज्ञान के परम लक्ष्य को प्राप्त किया। अंजर अब एक प्रसिद्ध तीर्थ स्थल है। अंजर के निवासी श्रद्धापूर्वक जैसल तथा तोरल की समाधियों पर नतमस्तक होते हैं तथा ग्रास्था एवम् समर्पण की यह गाथा आने वाले तीर्थ यात्रियों को सुनाते हैं। 
Leave a Reply