ढोंगी साधु तथा अन्य कथाएं
प्राचीन काल में, जब साक्षरता का अधिकार केवल कुछ भाग्यवान लोगों का था, तब ग्राम के लोग संध्या के समय, ग्रामीण भाट या किसी अभ्यागत बन्दी के सामने, उसकी कहानियां सुनने के लिए एकत्रित होते। बहुधा इन कहानियों की सूक्ष्म नैतिकता सामाजिक व्यवहार का आदर्श बनती। अतः, कुछ सीमा तक, लोगों के शुभ अथवा शुद्ध आचार-विचार का उत्तरदायित्व इन भाटों के सिर होता। ऐसी ही कहानियों में से हमने यह तीन कहानियाँ कथा सरित सागर से ली हैं । इन्हें पढ़, हमारे होठों पर एक हल्की सी मुस्कान, बुद्धि व चित्तस्थिरता के लिए प्रशंसा व किसी प्रभागे की मूर्खता के प्रति सहानुभूति पैदा होती है। 
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