Welcome to Madhur Sangrah - Another essence of MADHUR BAL PUSTAKALAYA | Classic n Vintage Old Books and Comics got here new Life | Reengage with your timeless classics and modern favorites |

Madhur Sangrah - Where Paper Meets Pixel

×
*चैत्र शुक्लपक्ष प्रतिपदा नव संवत्सर 2083 की हार्दिक शुभकामनाएं!*यह वेबसाइट निर्माणाधीन है!* *चैत्र शुक्लपक्ष प्रतिपदा नव संवत्सर 2083 की हार्दिक शुभकामनाएं!*यह वेबसाइट निर्माणाधीन है!*
Translate

ADCK-H-05-Dev Manav Aur Danav Ko Brahm Ka Aadesh

Wednesday, 25/03/2026 06:28 PM
Author
Chief Editor
Volume/Serial
05
Category
ADCK
Language
Hindi
ADCK-H-05-Dev Manav Aur Danav Ko Brahm Ka Aadesh

ADCK-H-05-Dev Manav Aur Danav Ko Brahm Ka Aadesh

Category 1
Category 3
NA
Category 4
NA

देव मानव और दानव को ब्रह्मा का आदेश

देव, मानव और दानव को ब्रह्म के प्रदेश: बृहदारण्यक उपनिषद् की कथा बड़ी सरल और शिक्षाप्रद है। इस कहानी में तीन प्रमुख गुणों- आत्म-संयम, दान और दया के अभ्यास का वर्णन है। चित्त में इन तीनों गुणों का विकास करने से सांसारिक सारूप्यता द्वारा महान् हर्ष व सुख प्राप्त होता है। इसके परिणामस्वरूप सम्पूर्ण व्यक्तित्व जीवन के उच्च मूल्यों पर केन्द्रित हो जाता है।
नचिकेता की कथा- - कठोपनिषद् की इस गूढ़ कथा में उस मानव-आत्मा का इतिहास बताया गया है, जो अपने ब्रह्मोन्मुखी मार्ग में दुःख, परीक्षा और अनुभूति के विभिन्न उतार-चढ़ावों से गुजरती है। आत्मा का पथ सरल नहीं है, बल्कि बहुत विकट और गूढ़ है। नचिकेता नामक इस दार्शनिक कथा में इसी रहस्य और कौतुक के दृष्टान्त वर्णित हैं। देवताओं का अभिमान : कठोपनिषद का प्रारम्भ ही इस प्रश्न से होता है-"इन्द्रियों और चित्त का संचालक व उत्प्रेरक कौन है?" इस प्रश्न का अर्थ है कि ऐसा अवश्य कोई परम नियम है जो इन्द्रियों, मन व बुद्धि को संचालित या प्रेरित करता है। लेकिन यह कर्मेन्द्रियां चाहे कितना भी प्रयास कर लें पर वह उस परम सत्य को प्राप्त नहीं कर सकतीं। अहंकार का पूर्णतः लोप हो जाने पर ही प्रात्मा की मुक्ति होती है।
दध्यान अर्थवान् महर्षि : बृहदारण्यक उपनिषद् में दध्यान मुनि द्वारा सिखाई गई मधु- विद्या का सार सृष्टि में वस्तुनों की परस्पर निर्भरता का वर्णन है। कोई भी वस्तु आत्म- निर्भर नहीं है | विश्व में कुछ भी आत्मभू या पृथक् नहीं है। प्रत्येक वस्तु दूसरी से सूत्र-बद्ध है। हर एक वस्तु दूसरी वस्तु पर निर्भर होने के कारण हर वस्तु दूसरी वस्तु का आलम्बन है। यह आलम्बन वह सर्वव्यापक ब्रह्म ही है। इसी ब्रह्म को मधु अथवा सृष्टि के प्राणियों का जीवनदायक भोजन कहते हैं। संक्षेप में, इससे यह नैतिक शिक्षा मिलती है कि स्वार्थ एक मिथ्या है। यह अस्तित्वहीन है। सहकारी क्रिया और परस्पर सम्मान ही सृष्टि का नियम है।

  • आदर्श चित्रकथा 
  • शीर्षक
  • संख्या : 05
  • कुल पृष्ठ : 36
  • लिपि : हिंदी
  • प्रकाशक : आर्गस सेंट्रल इंटरप्राइजेज नई दिल्ली-13 
  • प्रकाशन वर्ष : .......

Comments

Leave a Reply

Login to comment