बलराम की विजय
बलराम, श्री कृष्ण के बड़े भाई थे। वह अपने शारीरिक बल और सभी के प्रति एक समान व्यवहार के लिए विख्यात थे। एक दिन बलराम की आनन्द मनाने और मनोरंजन करने की इच्छा हुई। अतः वह अपने नौकर चाकरों के साथ खुले मैदानों और घने जंगलों की ओर चल पड़े। द्विविद रामायण का प्रसिद्ध कपि राजा था और मयन्द का भाई था। द्विविद वानर उस नरकासुर का भी भाई था जिसका श्री कृष्ण ने वध किया था। द्विविद वानर उन सभी यादवों पर क्रुद्ध था जिनके मुखिया बलराम और श्री कृष्ण थे। वह उनसे बदला लेना चाहता था। बलराम और उनके दल को नगर से बाहर पा उसने अवसर का लाभ उठाया। द्विविद वहां आकर एक सुरक्षित स्थान पर छिप गया और बलराम तथा उनके दल को प्रतिहिंसात्मक क्रियायों द्वारा सताने लगा। वह नगरों तथा गांवों को नष्ट-भ्रष्ट करता था, लोगों की स्त्रियों और बच्चों को उठा कर ले जाता था, उनकी धन सम्पति को आग लगा देता था और इस प्रकार के अन्य अनेक कुकृत्य करता था। वानर की धृष्टता को देखकर बलराम क्रोध से आग बबूला हो उठे। फिर एक द्वन्द्व शुरू हो गया जिसने भयंकर युद्ध का रूप ले लिया और इसमें द्विविद मारा गया।
फिर हमारे सामने वह दृश्य आता है जहां बलराम का कौरवों से सामना होता है। श्री कृष्ण के पुत्र साम्ब ने दुर्योधन की पुत्री लक्ष्मणा का अपहरण किया। इसके परिणाम- स्वरूप क्रुध कौरवों ने साम्ब को बन्दी बना लिया। बलराम के विचार में कौरव उनके मित्र व शुभेच्छुक थे अतः उन्होंने कौरवों को शान्त करके साम्ब और लक्ष्मणा को वापिस लाने की जिम्मेदारी स्वयं ली। लेकिन बलराम के हस्तिनापुर श्रागमन के उद्देश्य को सुन कर कौरवों ने उनका तथा समस्त यादव वंश का भरी सभा में अपमान किया। बलराम को बहुत क्रोध आया और उन्होंनें कौरवों की संम्पूर्ण नगरी को उखाड़ कर नदी में फेंकने का निश्चय किया। कौरवों ने भयभीत हो तत्काल ही साम्ब और लक्ष्मणा को बलराम को सौंप दिया। विजयी यादव नायक द्वारका लौटे। उन्हें देख कर उनके भाई और सभी नगर वासियों ने खुशियां मनाई।

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