ऋष्य श्रिंग
महाभारत में वन पर्व के अवसर पर वर्णित ऋष्यश्रृंग की कथा उदार ज्ञान का एक निमित्त है। सीमित ज्ञान भौतिक शक्तियों से प्रभावित होने के कारण शारीरिक और मानसिक विकास के लिए अपर्याप्त होता है; अतः ऐसा ज्ञान असुरक्षित होता है। जबकि दूसरी ओर उदार ज्ञान क्रमिक एवं प्रकल्पित प्रकाशनों से निश्चित रूप से सुरक्षित होता है। यह तो भारतीय ऋषियों के नैतिक स्तर का मापदण्ड है कि ऋष्यशृंग के संयमित पालन-पोषण ने उसे अज्ञान की ओर नहीं वरन् ज्ञान मार्ग पर अग्रसित किया। उसके प्रति निर्मल एवं शुद्ध होने के कारण ही सूखाग्रस्त तथा मरु भूमि पर वर्षा प्रारम्भ हो गई और सब और हरियाली ही हरियाली छा गई!

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