(कथासरित्सागर) श्रृंगभुज
'श्रृंगभुज' की यह कहानी ग्यारहवीं शताब्दी में संस्कृत में लिखित 'कथासरित्सागर' से ली गयी है। महल में रचे गये एक षड़यंत्र के कारण राजा वीरभुज का प्रिय पुत्र सुनहरे तीर की खोज में महल से बाहर निकल आता है। राजकुमार श्रृंग- भुज की मुलाकात रूपशिखा नाम की एक लड़की से होती है, जो उसकी मदद करती है। रूपशिखा राक्षसी होते हुए भी भली लड़की है, किन्तु इस युवा हम्पति को उसके क्रूर पिंता का सामना करना पड़ता है, जो राक्षस होने के कारण बहुत दुष्ट होता है। नायक और नायिका के साहसपूर्ण कारनामों के कारण पाठकों का कौतूहल निरंतर बढ़ता जाता है। हो लोकों - मनुष्य लोक और राक्षसं लोक के मिलन पर पाठक मंत्रमुग्ध रह जाते हैं। इसका प्रभाव सुखद भी है और गंभीर और साथ ही विस्मयकारक भी। यह अनु- भूति तब होती है जब श्रृंगभुज और रूपशिखा के मिलन से हो लोकों का मिलन होता है।

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