सुन्दरसेन
यह कहानी प्रसिद्ध पुस्तक ' कथा-सरित्सागर' से ली गयी है, जिसकी रचना कश्मीर के दरबारी कवि सोमदेव ने 11 वीं शताब्दी में की थी। सुन्दरसेन अपनी भावी दुल्हन हंसद्वीप की राजकुमारी मन्दारवती से मिलने के लिए समुद्रों को पार करता हुआ निकल पड़ता है। अपने भावी पति से मिलने को व्याकुल मन्दारवती भी हंसद्वीप से चल पड़ती है। पढ़ने में सुन्दरसेन की यह कहानी आज की मारधाड़ भरी और रोमांचकारी कहानी लगती है, लेकिन वास्तव में यह कहानी है, उस सागर रूपी ग्रन्थ से, जिसमें हजारों कथा-सरिताओं का संगग हुआ है। इसीलिए इसे कथासरित्सागर' कहा गया है, जिसका शाब्दिक अर्थ है, कहानियों की सरिताओं का सागर। 'कथासरित्सागर' की रचना भी बड़े आकर्षक ढंग से की गयी है। एक कहानी में से दूसरी और दूसरी में से तीसरी; इसप्रकार कहानियों का एक लम्बा सिलसिला शुरू हो जाता है। लगभग सभी पात्र कहानियों का जाल बुनते जाते हैं। ये कहानियां पाठक को ऐसे संसार में ले चलती है, जहां हर किस्म के लोग हैं, बुद्धिमान और मुर्ख, भलेमानस और चोर, रागी और वैरा देवता और दानव, जादूगर, कपटी और षड्यंत्रकारी। 'कथा. सरित्सागर' का विषय उतना ही व्यापक है, जितना वि स्वयं जीवन का। इन कहानियों में पूर्व की प्रतिमा, जीवन- दर्शन, मानव और भौतिक पदार्थों के प्रति उनके दृष्टिकोण की सार्थक अभिव्यक्ति हुई है। इसकी कहानियों ने आज से 600 वर्ष पूर्व एक राजघराने के लोगों को मंत्रमुग्ध कर दिया था।
राजकुमार सुंदरसेन और राजकुमारी मंदरावती की कहानी!
बहुत समय पहले निषाद देश में सुंदरसेन नाम के एक वीर राजकुमार रहते थे। एक दिन शिकार पर जाते समय उन्हें एक बूढ़ी औरत मिली, जिसने उन्हें हंसद्वीप की खूबसूरत राजकुमारी मंदरावती के बारे में बताया। सुंदरसेन ने जब राजकुमारी की तस्वीर देखी, तो उन्हें उनसे तुरंत प्रेम हो गया। दोनों के परिवारों ने उनकी शादी पक्की कर दी। राजकुमारी मंदरावती जहाज से राजकुमार से मिलने के लिए निकलीं, लेकिन समुद्र में एक भयानक तूफान आ गया। उनका जहाज टूट गया और वे एक अनजान टापू पर पहुँच गईं। वहाँ एक दयालु साधु ने उन्हें सहारा दिया। दूसरी तरफ, जब सुंदरसेन को खबर मिली, तो वे भी उन्हें खोजने निकल पड़े। 
उनके साथ भी वही हुआ—तूफान ने उनका जहाज भी डुबो दिया। सुंदरसेन और उनका एक दोस्त किसी तरह तैरकर किनारे पहुँचे। किस्मत से दोनों एक ही टापू पर थे। एक दिन सुंदरसेन ने राजकुमारी को एक मगरमच्छ से बचाया। दोनों एक-दूसरे को पाकर बहुत खुश हुए। लेकिन खुशी ज्यादा देर नहीं टिकी। एक लालची व्यापारी ने राजकुमारी को धोखे से अपने जहाज पर चढ़ा लिया, और सुंदरसेन को वहीं छोड़कर भाग गया। सुंदरसेन दुखी होकर जंगल में भटकने लगे, जहाँ डाकुओं ने उन्हें पकड़ लिया और देवी को बलि देने के लिए ले गए। वहाँ सुंदरसेन को पता चला कि डाकुओं का राजा उनके पिता का पुराना परिचित था। राजा ने उनसे माफी मांगी और उन्हें आजाद कर दिया। तभी डाकुओं ने उस व्यापारी को भी पकड़ लिया जिसने राजकुमारी को कैद किया था। इस तरह सुंदरसेन और मंदरावती फिर से मिल गए। सुंदरसेन ने उस व्यापारी को माफ कर दिया। इसके बाद वे सब खुशी-खुशी अपने राज्य अलका वापस लौट आए। वहाँ बड़ी धूमधाम से दोनों का विवाह हुआ और सुंदरसेन नए राजा बने। पूरा शहर रोशनी और संगीत से जगमगा उठा।

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