लीला और चनेसर
लीला और चनेसर की कहानी सिंघ की सात प्रसिद्ध विरह- कथाओं में से एक है। इस कहानी को सबसे पहले सन् 1632 ईस्वी में नसरपुर के कवि अदरकी बेलगरी ने फ़ारसी मसनवी' चनेसरनामा' में लिखा था। लेकिन इस दंतकथा की भारी लोकप्रियता के प्रमुख कारण हैं शाह अब्दुल लतीफ़, जिन्होंने इस कहानी को अपने प्रसिद्ध रिसालो में सुर लीला चनेसर शीर्षक से विरह कथा के रूप में लिखा था। लीला का विवाह टेबल बंदर (आज के कराची के पास) के राजा चनेसर के साथ हो गया। दोनों सुखी जीवन बिताने लगे, लेकिन अचानक ही लीला का मन एक नवलखे हार के लिए ललक उठा और इस ललक के आगे पति का प्रेम भी फीका पड़ गया। जिसके कारण उसे अपमानित होना पड़ा और पछतावे के बावजूद उसे राज्य से बाहर निकाल दिया गया। निर्वासित प्रियतमा के दुख और करुणा तथा अपने पति को दुबारा से जीतने के लिए उसके संघर्ष की कहानी सुर लीला चनेसर में बड़े ही खूबसूरत ढंग से चित्रित की गयी है। शाह अब्दुल लतीफ़ के लिए, कहानी प्रेम के अपने दर्शन को अभिव्यक्त करने का एक माध्यम है। लीला रूह (आत्मा) की प्रतीक है, जो हमेशा हक (परमात्मा) से मिलने के लिए संघर्ष कर रही है। मध्ययुग के अनेक मुस्लिम सूफ़ी कवियों के लिए भौतिक प्रेम रूहानी प्रेम की दिशा में ही एक कट्टम है। वे अपने दर्शन को अभि- व्यक्त करने के लिए लोकप्रिय हिन्दू दंतकथाओं का प्रयोग किया करते थे।

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