हंसावली
कथासरित्सागर' की रचना 11 वीं शताब्दी में कश्मीर के हरबारी कवि सोमदेव द्वारा की गयी थी। यह एक ऐसा सागर है, जिसमें हजारों कथा-सरिताओं का संगग हुआ है। इसीलिए इसे कथासरित्सागर' कहा गया है, जिसका शाब्दिक अर्थ है, कहानियों की सरिताओं का सागर। 'कथासरित्सागर' की रचना भी बड़े आकर्षक ढंग से की गयी है। एक कहानी में से दूसरी और दूसरी में से तीसरी; इसप्रकार कहानियों का एक लम्बा सिलसिला शुरू हो जाता है। लगभग सभी पात्र कहानियों का जाल बुनते जाते हैं। ये कहानियां पाठक को ऐसे संसार में ले चलती है, जहां हर किस्म के लोग हैं, बुद्धिमान और सून, भलेमानस और चोर, रागी और वैरा देवता और दानव, जादूगर, कपटी और षड्यंत्रकारी। 'कथा. सरित्सागर' का विषय उतना ही व्यापक है, जितना वि स्वयं जीवन का। इन कहानियों में पूर्व की प्रतिमा, जीवन- दर्शन, मानव और भौतिक पदार्थों के प्रति उनके दृष्टिकोण की सार्थक अभिव्यक्ति हुई है। हंसावली की कहानी एक सुंदर राजकुमार और राजकुमारी के प्रेम की सीधी-सादी कहानी है। वे एक-दूसरे से प्रेम करते हैं, करीब आते हैं और फिर भाग्य के क्रूर हाथों में पड़कर सामने आयी मुसीबतों का सामना करते हैं। चतुरंग कथा में प्राचीन भारत के अक्षर साहित्य 'की और भी अनेक कहानियां प्रस्तुत की जाएंगी। ये वे कहानियां हैं, जिन्हें पढ़कर दुनिया अन के पाठक मंत्रमुग्ध रह जाते हैं।

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