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Gaurav Gatha-H-14-Sri Arvind

Monday, 30/03/2026 05:19 PM
Author
Chief Editor
Volume/Serial
14
Category
GG
Language
Hindi
Gaurav Gatha-H-14-Sri Arvind

Gaurav Gatha-H-14-Sri Arvind

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NA
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श्री अरविन्द

श्री अरविन्द केवल एक दार्शनिक या योगी ही नहीं थे, एक संवेदनशील कवि और राजनीतिक नेता भी थे। उनकी शिक्षा-दीक्षा इंग्लैण्ड में हुई और नौकरी उन्होंने बड़ौदा (भारत) में की। विवेकानन्द और बंकिमचन्द्र की रचनाओं के प्रभाव से वह क्रांतिकारी बने। कवि हृदय की भावुकता के साथ उनमें क्रांति का उत्साह भी था, जो उनके राजनीतिक लेखों में व्यक्त हुआ। अरविंद भूमिगत क्रांतिकारी प्रांदोलन से भी जुड़े रहे और उन पर मुकद्दमा भी चला, पर वह निर्दोष साबित हुए। इसी बीच जेल में बिताए गए समय में वह प्राध्यात्मिकता की ओर उन्मुख हुए। 1910 में सक्रिय राजनीति छोड़ कर उन्होंने स्वयं को आध्यात्मिकता के लिये समर्पित कर दिया। पांडिचेरी में स्थापित उनके आश्रम ने देश-विदेश के लोगों को प्रकृष्ट किया। लगभग चालीस वर्षों तक वे दर्शन, चिंतन-मनन और आत्मिक ज्ञान में डूबे रहे और भारत के महान् दार्शनिक के रूप में विश्व भर में प्रसिद्ध हुए।

लार्ड कर्जन के बंग-भंग की योजना रखने पर सारा देश तिलमिला उठा। बंगाल में इसके विरोध के लिये जब उग्र आन्दोलन हुआ तो अरविन्द घोष ने इसमे सक्रिय रूप से भाग लिया। नेशनल ला कॉलेज की स्थापना में भी इनका महत्वपूर्ण योगदान रहा। मात्र ७५ रुपये मासिक पर इन्होंने वहाँ अध्यापन-कार्य किया। पैसे की जरूरत होने के बावजूद उन्होंने कठिनाई का मार्ग चुना। अरविन्द कलकत्ता आये तो राजा सुबोध मलिक की अट्टालिका में ठहराये गये। पर जन-साधारण को मिलने में संकोच होता था। अत: वे सभी को विस्मित करते हुए 19/8 छक्कू खानसामा गली में आ गये। उन्होंने किशोरगंज (वर्तमान में बंगलादेश में) में स्वदेशी आन्दोलन प्रारम्भ कर दिया। अब वे केवल धोती, कुर्ता और चादर ही पहनते थे। उसके बाद उन्होंने राष्ट्रीय विद्यालय से भी अलग होकर अग्निवर्षी पत्रिका वन्देमातरम् का प्रकाशन प्रारम्भ किया।

ब्रिटिश सरकार इनके क्रन्तिकारी विचारों और कार्यों से अत्यधिक आतंकित थी अत: २ मई १९०८ को चालीस युवकों के साथ उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। इतिहास में इसे 'अलीपुर षडयन्त्र केस' के नाम से जानते है। उन्हें एक वर्ष तक अलीपुर जेल में कैद रखा गया।| अलीपुर जेल में ही उन्हें हिन्दू धर्म एवं हिन्दू-राष्ट्र विषयक अद्भुत आध्यात्मिक अनुभूति हुई। इस षड़यन्त्र में अरविन्द को शामिल करने के लिये सरकार की ओर से जो गवाह तैयार किया था उसकी एक दिन जेल में ही हत्या कर दी गयी। घोष के पक्ष में प्रसिद्ध बैरिस्टर चितरंजन दास ने मुकदमे की पैरवी की थी। उन्होने अपने प्रबल तर्कों के आधार पर अरविन्द को सारे अभियोगों से मुक्त घोषित करा दिया। इससे सम्बन्धित अदालती फैसले ६ मई १९०९ को जनता के सामने आये। ३० मई १९०९ को उत्तरपाड़ा में एक संवर्धन सभा की गयी वहाँ अरविन्द का एक प्रभावशाली व्याख्यान हुआ जो इतिहास में उत्तरपाड़ा अभिभाषण के नाम से प्रसिद्ध हुआ। उन्होंने अपने इस अभिभाषण में धर्म एवं राष्ट्र विषयक कारावास-अनुभूति का विशद विवेचन करते हुए कहा था। 

"जब मुझे आप लोगों के द्वारा आपकी सभा में कुछ कहने के लिए कहा गया तो में आज एक विषय हिन्दू धर्मं पर कहूँगा। मुझे नहीं पता कि मैं अपना आशय पूर्ण कर पाउँगा या नहीं। जब में यहाँ बैठा था तो मेरे मन में आया कि मुझे आपसे बात करनी चाहिए। एक शब्द पूरे भारत से कहना चाहिये। यही शब्द मुझसे सबसे पहले जेल में कहा गया और अब यह आपको कहने के लिये मैं जेल से बाहर आया हूँ।"

"एक साल हो गया है मुझे यहाँ आए हुए। पिछली बार आया था तो यहाँ राष्ट्रीयता के बड़े-बड़े प्रवर्तक मेरे साथ बैठे थे। यह तो वह सब था जो एकान्त से बाहर आया जिसे ईश्वर ने भेजा था ताकि जेल के एकान्त में वह इश्वर के शब्दों को सुन सके। यह तो वह ईश्वर ही था जिसके कारण आप यहाँ हजारों की संख्या में आये। अब वह बहुत दूर है हजारों मील दूर |"

 

  • गौरव गाथा
  • शीर्षक          : श्री अरविन्द
  • अंक             : 14
  • कुल पृष्ठ        : 36
  • भाषा             : हिंदी
  • प्रकाशक       : गौरव गाथा पब्लिकेशन, नई दिल्ली 
  • प्रकाशन वर्ष  : जुलाई 1982

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