दलाई लामा
परम पावन चौदहवें दलाई लामा तेनज़िन ग्यात्सो 29 मई 2011 तक तिब्बत के राजकीय प्रमुख रहे और उपरोक्त तिथि पर उन्होंने अपनी सारी राजनीतिक शक्तियाँ तथा उत्तरदायित्व प्रजातांत्रिक तरीके से चुने हुए तिब्बती नेतृत्व को हस्तांतरित किये। अब वे केवल तिब्बत के सर्वोच्च आध्यात्मिक गुरु हैं। उनका जन्म 6 जुलाई 1935 को उत्तरी तिब्बत में आमदो के एक छोटे गाँव तकछेर में एक कृषक परिवार में हुआ था। दो वर्ष की आयु में ल्हामो दोंडुब नाम का वह बालक तेरहवें दलाई लामा थुबतेन ग्यात्सो के अवतार के रूप में पहचाना गया। ऐसा विश्वास है कि दलाई लामा अवलोकितेश्वर या चेनेरेज़िग का रूप हैं जो कि करुणा के बोधिसत्त्व तथा तिब्बत के संरक्षक संत हैं। बोधिसत्त्व प्रबुद्ध सत्त्व हैं जिन्होंने अपना निर्वाण स्थगित कर मानवता की सेवा के लिए पुनः जन्म लेने का निश्चय लिया है। 1989 में तिब्बत को स्वतंत्र कराने में उनके अहिंसात्मक संघर्ष के लिए उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया। अत्यधिक आक्रात्मक स्थितियो में भी वे निरंतर अहिंसात्मक नीतियों का समर्थन करते रहे हैं। वे पहले नोबेल विजेता हुए हैं जिन्होंने वैश्विक पर्यावरण की समस्याओं के प्रति अपनी चिंता जताई।
दलाई लामा 6 महाद्वीपों के 62 से भी अधिक देशों की यात्रा कर चुके हैं। वे बड़े देशों के राष्ट्रपतियों, प्रधानमंत्रियों और राजकीय शासकों से मिले हैं। वे विभिन्न धर्मों के प्रमुखों और जाने माने वैज्ञानिकों से भी संवाद कर चुके हैं। उनके शांति, अहिंसा, अंतर्धर्मीय समझ, सार्वभौमिक उत्तरदायित्व तथा करुणा के संदेश को देखते हुए 1959 से दलाई लामा को 84 से भी अधिक सम्मान, सम्माननीय डॉक्टरेट, पुरस्कार इत्यादि मिल चुके हैं। दलाई लामा ने 72 से भी अधिक पुस्तकें लिखी है। दलाई लामा स्वयं को एक साधारण बौद्ध भिक्षु कहकर संबोधित करते हैं।

1956 में तिब्बत - नरेश दलाई लामा चीनी साम्यवादियों को चकमा देकर बच निकले और भारत आ गये थे। चीनी सैनिकों और हवाई जहाज़ों के निरंतर हमले का जोखिम उठाकर ऊँचे-ऊँचे दुर्लंघ्य दर्रों और वेगवती नदियों को पार करते हुए उन्होंने भारत-सीमा तक की 300 मील लंबी दुर्गम यात्रा की थी। अद्भुत जीवट का काम था यह रोमांचकारी और अविश्वसनीय! पटाक्षेप के क्षण तक यह नाटक कौतूहल से भरा हुआ था! प्रासमान की ऊँचाइयों को छूता हुआ तिब्बत देश हिमालय की अगम प्राचीर के पार बसा हुआ है। यहाँ के लोग सीधे-सादे, शांतिप्रिय और धर्मपरायण हैं । उनका धर्म बौद्ध धर्म का ही एक रूप है। 'ओ३म् मणि पदमेह' (हृदय - कमल में विराजमान भगवत्-मणि की जय !) उनका परम पवित्र मंत्र है। तिब्बत की राजधानी ल्हासा में दलाई लामा का पोताला प्रासाद गर्व से सिर ऊँचा उठाये आकाश से बातें करता है । महल के लगभग एक हज़ार कमरे तिब्बती कला की विलक्षण प्रतिमाओं और चित्रों से सुसज्जित हैं।
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