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Gaurav Gatha-H-08-Lala Lajapat Rai

Monday, 30/03/2026 07:05 PM
Author
Chief Editor
Volume/Serial
08
Category
GG
Language
Hindi
Gaurav Gatha-H-08-Lala Lajapat Rai

Gaurav Gatha-H-08-Lala Lajapat Rai

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लाला लाजपत राय

लाला लाजपत राय (जन्म 28 जनवरी 1865) भारत के एक प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी थे। इन्हें पंजाब केसरी भी कहा जाता है। इन्होंने पंजाब नैशनल बैंक और लक्ष्मी बीमा कम्पनी की स्थापना भी की थी। ये भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में गरम दल के तीन प्रमुख नेताओं  बाल गंगाधर तिलक और बिपिन चंद्र पाल के साथ इस त्रिमूर्ति को लाल-बाल-पाल के नाम से जाना जाता था। इन्हीं तीनों नेताओं ने सबसे पहले भारत में पूर्ण स्वतन्त्रता की माँग की थी बाद में समूचा देश इनके साथ हो गया। इन्होंने स्वामी दयानन्द सरस्वती के साथ मिलकर आर्य समाज को पंजाब में लोकप्रिय बनाया। लाला हंसराज के साथ दयानन्द एंग्लो वैदिक विद्यालयों का प्रसार किया भाग जिन्हें आजकल डीएवी स्कूल्स व कालेज के नाम से जाना जाता है। लालाजी ने अनेक स्थानों पर अकाल में शिविर लगाकर लोगों की सेवा भी की थी। 30 अक्टूबर 1928 को इन्होंने लाहौर में साइमन कमीशन के विरुद्ध आयोजित एक विशाल प्रदर्शन में हिस्सा लिया, जिसके दौरान हुए लाठी-चार्ज में ये बुरी तरह से घायल हो गये। उस समय इन्होंने कहा था: "मेरे शरीर पर पड़ी एक-एक लाठी ब्रिटिश सरकार के ताबूत में एक-एक कील का काम करेगी।" और वही हुआ भी; लालाजी के बलिदान के 20 साल के भीतर ही ब्रिटिश साम्राज्य का सूर्य अस्त हो गया। 17 नवंबर 1928 को इन्हीं चोटों की वजह से इनका देहान्त हो गया। 

लाला लाजपतराय आजादी के दिवाने, देश के सच्चे सेवक और राष्ट्र के सपूत थे। जिनकी आवाज की गूंज ने सोते हुए देशवासियों को जगाया और शत्रुओं को ललकारा। गांधी जी के आविभाव से पहले ही उन्होंने अपने देशवासियों के हृदय में सेवा, त्याग, तथा सहनशीलता की भावना जागृत कर दी थी। एक अध्यापक और समाज सुधारक के नाते उनका देश के प्रति योगदान अमूल्य है। वक्ता के रूप में उनका कोई सानी न था। वह निडर थे। यदि उन्हें उकसाया जाता तो सिंह गर्जना करते थे, अतः उन्हें शेर-ए-पंजाब पुकारा जाता था। उन्होंने कांग्रेस से साफ-साफ कह दिया था कि सीधी अंगुलियों घी नहीं निकलेगा। अंग्रेज की चापलूसी करने और उससे सौदा चुकाने से काम नहीं चलेगा। हमें वीरों की तरह मैदान में आना चाहिए। बालगंगाधर तिलक तथा विपिनचन्द्रपाल के साथ मिलकर उन्होंने देश में जागृति पैदा की। यह त्रिमूर्ति लाल-बाल-पाल के नाम से प्रसिद्ध हुई। इन तीनों ने समय की पुकार को सुना तथा कठिनाइयों की परवाह न  करके ब्रिटेन से टक्कर ली, जिसके लिए कहा जाता था कि उसका सूर्य कभी अस्त नहीं होता। लाला जी ने वह चिन्गारी लगाई जिसकी ज्वाला सदा दहकती रहती है। उन्होंने अपना तन-मन-धन मातृसेवा तथा गरीब देशवासियों की सेवा में न्यौछावर कर दिया। वह शान से जिए और शान से मरे।

  • गौरव गाथा 
  • शीर्षक         : लाला लाजपत राय
  • अंक             : 08
  • कुल पृष्ठ        : 36
  • भाषा            : हिंदी
  • प्रकाशक      : गौरव गाथा पब्लिकेशन, नई दिल्ली 
  • प्रकाशन वर्ष : जून 1981

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