सूर्य सेन
सूर्य सेन भारत की स्वतंत्रता संग्राम के महान क्रान्तिकारी थे। सूर्य सेन के पिता का नाम था। चटगांव के नोआपारा इलाके के निवासी रमानिरंजन के पुत्र सूर्य सेन एक अध्यापक थे, वे नेशनल हाईस्कूल में सीनियर ग्रेजुएट शिक्षक के रूप में कार्यरत थे और लोग प्यार से उन्हें "मास्टर दा" कहकर सम्बोधित करते थे। 1916 में उनके एक अध्यापक ने उनको क्रांतिकारी विचारों से प्रभावित किया जब वह इंटरमीडियेट की पढ़ाई कर रहे थे और वह अनुशिलन समूह से जुड़ गये। बाद में वह बहरामपुर कालेज में बी ए की पढ़ाई करने गये और जुगन्तर से परिचित हुए और जुगंतकर के विचारों से काफी प्रभावित रहे। उन्होने इंडियन रिपब्लिकन आर्मी की स्थापना की और चटगांव विद्रोह का सफल नेतृत्व किया। घटना 18 अप्रैल 1930 से शुरू होती है जब बंगाल के चटगांव में आजादी के दीवानों ने अंग्रेजों को उखाड़ फेंकने के लिए सूर्यसेन के नेतृत्व में दर्जनों क्रांतिकारियों ने चटगांव के शस्त्रागार को लूटकर अंग्रेज शासन के खात्मे की घोषणा कर दी। क्रांति की ज्वाला के चलते हुकूमत के नुमाइंदे भाग गए और चटगांव में कुछ दिन के लिए अंग्रेजी शासन का अंत हो गया।इस घटना ने आग में घी का काम किया और बंगाल से बाहर देश के अन्य हिस्सों में भी स्वतंत्रता संग्राम उग्र हो उठा। इस घटना का असर कई महीनों तक रहा। पंजाब में हरिकिशन ने वहां के गवर्नर की हत्या की कोशिश की। दिसंबर 1930 में विनय बोस, बादल गुप्ता और दिनेश गुप्ता ने कलकत्ता की राइटर्स बिल्डिंग में प्रवेश किया और स्वाधीनता सेनानियों पर जुल्म ढ़हाने वाले पुलिस अधीक्षक को मौत के घाट उतार दिया। आईआरए की इस जंग में दो लड़कियों प्रीतिलता वाडेदार और कल्पना दत्त ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सत्ता डगमगाते देख अंग्रेज बर्बरता पर उतर आए। महिलाओं और बच्चों तक को नहीं बख्शा गया। आईआरए के अधिकतर योद्धा गिरफ्तार कर लिए गए और तारकेश्वर दत्तीदार को फांसी पर लटका दिया गया। अंग्रेजों से घिरने पर प्रीतिलता ने जहर खाकर मातृभमि के लिए जान दे दी, जबकि कल्पना दत्त को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। सूर्यसेन को फरवरी 1933 में गिरफ्तार कर लिया गया और 12 जनवरी 1934 को अंग्रेजों ने उन्हें फांसी दे दी। 
यह कहानी है सूर्यसेन की, जो भारत के स्वतन्त्रता- श्राकाश पर दीप्तिमान अनेक सेनानियों में एक चमकता हुआ सितारा था। चटगांव के एक स्कूल में अध्यापक, सूर्य- सेन को 'मास्टर दा' के नाम से जाना जाता था। मास्टर दा ने 'भारतीय गणतंत्रवादी 'सेना' चटगांव शाखा के नाम से एक क्रांतिकारी दल की स्थापना की। 18 अप्रैल, 1930 को हुए सैनिक विद्रोह का उन्होंने सफलता पूर्वक नेतृत्व किया और जलालाबाद की पहाड़ी पर ब्रिटिश सेना के विरुद्ध बहादुरी से लड़ाई लड़ी। मई 1930 से फरवरी 1933 के दौरान भूमिगत रह कर मास्टर दा ने चटगांव में ब्रिटिश सैनिक शासन के खिलाफ अनेक क्रांतिकारी गतिविधियों का संचालन किया। इन क्रांतिकारी गतिविधियों ने बंगाल में ब्रिटिश शासन की जड़ें हिला कर रख दीं। उन्होंने अपनी गिरफ्तारी के सभी प्रयत्नों को नाकामयाब बनाया। उनकी बहादुरी की चर्चा घर घर होती थी। लेकिन फरवरी 1933 में एक गद्दार की वजह से वे पकड़े गए और उन्हें पुलिस की क्रूर यातनाओं का शिकार होना पड़ा। 12 फरवरी, 1934 को उन्हें फांसी दे दी गई। चटगांव के क्रांतिकारियों में से एक कल्पना दत्त, जिन्हें आजीवन कारावास की सजा हुई थी, प्रसिद्ध कम्युनिस्ट नेता स्वर्गीय पी० सी० जोशी की पत्नी के रूप में आज भी हमारे बीच मौजूद हैं।
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